Friday, June 26, 2026

Karbala - 1

 कर्बला:- प्रथम भाग

पहली बात तो यह कि जो लोग "यौम ए आशुरा" को मनहूस समझते हैं वह खुद मनहूस होते हैं, क्योंकि मरते तो सभी हैं मगर शहादत किस्मत वालों को मिलती है...
आशूरा (عاشوراء) अरबी शब्द "عشرة" (अशरह) से बना है, जिसका हिन्दी में अर्थ है "दसवां"। इसलिए "यौम ए आशूरा" का अर्थ है "दसवाँ (दिन)", यानी मुहर्रम महीने का 10वाँ दिन।
इस्लामिक इतिहास में "यौम ए आशुरा" का दिन बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए जाना जाता है...
हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने इसी दिन पैदा किया था और वह दिन भी जुमा का दिन था।
मुहर्रम की दस तारीख अर्थात "यौम ए आशुरा" के ही दिन हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कबूल हुई , वह दिन भी जुमा का दिन था।
मुहर्रम की दस तारीख अर्थात "यौम ए आशुरा" के ही दिन हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की किश्ती जूदी पर्वत पर ठहर गई थी, वह दिन भी जुमा का ही दिन था।
मुहर्रम की दस तारीख अर्थात "यौम ए आशुरा" के ही दिन हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम का मछली के पेट से निकलना हुआ और वह दिन भी जुमा का ही दिन था।
क़यामत का दिन भी तय है और वह दिन "आशूरा का दिन" होगा और उस दिन जुमा होगा।
मुहर्रम की दस तारीख अर्थात "यौम ए आशुरा" को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और बनी इस्राईल को फ़िरऔन से निजात मिली और लाल सागर ने उन्हें रास्ता दिया.... और वह दिन भी जुमा का दिन था।
"आशूरा के दिन" इस कारण यहूदी लोग रोज़ा रखते थे और हज़रत मुहम्मद ﷺ हिजरत करके जब मदीना पहुँचे तो उन्होंने देखा कि यहूदी 10 मुहर्रम का रोज़ा रखते हैं।
उन्होंने बताया कि इस दिन अल्लाह ने मूसा और बनी इस्राईल को फ़िरऔन से बचाया था। तब नबी ﷺ ने भी इस दिन रोज़ा रखा और मुसलमानों को भी रखने की प्रेरणा दी।
मगर यह रोज़ा यहूदियों की नकल न लगे इसलिए उन्होंने इसके एक दिन पहले और एक दिन बाद भी रोज़ा रखा...जो उनकी उम्मत आज तक रखती है।
इसी दिन 61 हिजरी सन् 680 ई में हज़रत हुसैन रजि• करबला में शहीद हुए , इस्लामिक रिवायतों के अनुसार उस दिन भी शूक्रवार था।
आज यौम ए आशुरा का दिन है और आज भी जुमा का ही दिन है...
कर्बला का वाकया समझने के लिए आपको पैगंबर मुहम्मद ﷺ के बाद उनके उत्तराधिकारी ख़लीफाओं को सबसे पहले समझना होगा।
उनमें सबसे पहले ख़लीफा बने हजरत अबू बक्र सिद्दीक रज़ि• (632-634 ईस्वी) इसके बाद हजरत उमर इब्ने अल-खत्ताब रज़ि• (634-644 ईस्वी) फ़िर हजरत उस्मान इब्ने अफ्फान रज़ि• (644-656 ईस्वी) , और हजरत अली इब्ने अबू तालिब रज़ि• (656-661 ईस्वी) और 28 जनवरी 661 ई. से अगस्त 661 ई‌ तक हज़रत हसन रजि•...जब उन्होंने हज़रत मुआविया के साथ संधि कर ख़िलाफ़त छोड़ दी।
हिंदू भाई समझ लें कि इब्ने का अर्थ होता है पुत्र
अर्थात रमेश पुत्र सुरेश
और ख़िलाफ़त का अर्थ होता है नेतृत्व, खलीफा का अर्थ नेता
हजरत अली रजि• और हज़रत हसन रजि• के बाद मुआविया इब्ने अबू सुफियान रजि• ने 661 ईस्वी में इस्लाम की खिलाफत संभाली जिसके साथ उमय्यद खलीफा वंश की शुरुआत हुई।
यहां तक ख़लीफा चुनने के लिए आपस में राय मशविरा होता था और सबकी सहमति से ख़लीफा चुन लिया जाता था और इसी तरह सबके राय मशविरे से इस्लाम के शुरुआती सभी उपरोक्त ख़लीफा चुने गए थे।
मुआविया इब्ने अबू सुफियान के पिता अबू सुफ़ियान बिन हरब ने पैगंबर मुहम्मद ﷺ के प्रारंभिक मिशन (610-630 ईस्वी) के दौरान कुरैश कबीले के नेता के रूप में इस्लाम और हज़रत मुहम्मद ﷺ का तिव्र विरोध किया।
इन 20 वर्षों में उन्होंने बैतुल्लाह (मक्का) में मुसलमानों के खिलाफ बदर, उहुद, और खंदक जैसे युद्ध लड़े मगर 630 ईस्वी में मक्का की विजय के बाद अबू सुफ़ियान ने अपनी पत्नी हिंद और परिवार सहित इस्लाम कबूल कर लिया।
इसके बाद, वह पैगंबर मुहम्मद ﷺ के सहाबी बन गए। पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ की वफ़ात 632 ईस्वी में हुई, इसलिए अबू सुफ़ियान का पैगंबर मुहम्मद ﷺ के साथ सहाबी के रूप में लगभग दो साल तक रहा।
इन्हीं अबू सुफ़यान के बेटे हज़रत मुआविया इस्लाम के छठवें ख़लीफा थे जिनका शासन दमिश्क (सीरिया) से चलता था और यह इस्लामिक दुनिया के पहले बादशाह थे।
खिलाफ़त मुआविया की ख़िलाफ़त लगभग 19 वर्ष (661-680 ईस्वी) तक रही और इस 19 सालों में इन्होंने सारे कबीलों को एक करके सबको अपने पक्ष में कर के एक सल्तनत में बदला।
राजनीति और कूटनीति के माहिर खिलाड़ी हज़रत मुआविया खलीफा चुनने में अहम कबीलों के सभी सरदारों को मंहगे मंहगे उपहार और इज़्ज़त देते उन्हें अपने महल में बुलाकर उनकी खातिर करते और यही कारण है कि उनके 19 वर्ष की ख़िलाफत में कोई जंग नहीं हुई और सारे लोग उन्हें बादशाह मानते रहे। हज़रत हसन रजि• भी जो हज़रत मुहम्मद ﷺ के नाती और हज़रत हुसैन के भाई थे।
उनके दरबारियों ने मुआविया के ख़िलाफत के 10वें साल में उन्हें समझना शुरू कर दिया कि आपके बाद ख़लीफा के नाम पर फिर ख़ून ख़राबा होगा इसलिए बेहतर है कि आप ही कोई ख़लीफा नामजद कर दें और सबसे बेहतर "यजीद" होगा जो हज़रत मुआविया का बेटा था।
हज़रत मुआविया ने शुरू में इसे ख़लीफा परंपरा के विरुद्ध समझ कर मना कर दिया मगर बाद में इसे स्वीकार कर लिया और यजीद को "वली ए अहद' अर्थात जीते जी अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया जिस पर अरब जगत के तमाम कबीलाई सरदारों ने सहमति दी।
हज़रत मुआविया ने अपने बाद अपने बेटे "यजीद" को "वली ए अहद" नियुक्त करके खलीफ़ा की परंपरा में वंशवाद की शुरुआत कर दी जिसका विरोध 5 लोगों ने किया ..
1- अब्दुल रहमान इब्ने अबू बक्र 2-अब्दुल्ला इब्ने उमर 3- अब्दुल्ला इब्ने ज़ुबैर 4- अब्बास अब्दुल्ला इब्ने अब्बास और 5- हज़रत इमाम हुसैन बिन अली जो पैगंबर मुहम्मद ﷺ के नाती थे।
तब तक हज़रत इमाम हुसैन के भाई हज़रत हसन का इंतकाल हो चुका था, ऐसा माना जाता है कि उन्हें ज़हर दिया गया था।
हज़रत इमाम हुसैन के यजीद के विरोध का कारण था कबीलाई परंपरा और ख़लीफा चुनने की एक लोकतांत्रिक परंपरागत प्रक्रिया के विरुद्ध वंशवादी उत्तराधिकारी "वली ए अहद" को बादशाह/ख़लीफा बनाना।
हज़रत मुआविया ने अपने जीते जी इन लोगों को मनाने की बहुत कोशिश की कि यह लोग भी यजीद के नाम पर सहमत हो जाएं। वह खुद दमिश्क से चलकर मदीना गए सबसे बात की मगर कामयाब नही हो सके‌।
यजीद बिन मुआविया को वसीयत करते हुए उसके वालिद हज़रत मु्आविया ने कहा कि "मैंने तुम्हारे रास्ते आसान कर दिए और तुम्हारी बादशाहत के सारे विरोधियों को मिला लिया है मगर तीन लोगों से तुम सावधान रहना" जिसमें तीसरा नाम था हज़रत इमाम हुसैन इब्ने अली का.....
हज़रत मुआविया ने यजीद से कहा कि हुसैन एक सीधे और सम्मानित आदमी हैं मगर ईराक के लोग उन्हें तुम्हारे खिलाफ बग़ावत के लिए भड़काएंगे। अगर ऐसा हो और तुम उनपर जीत हासिल करो तो उन्हें माफ़ कर देना क्योंकि वह पैगंबर मुहम्मद ﷺ के नवासे हैं, हमारे रिश्तेदार हैं और उनका बहुत बड़ा हक़ है।
मगर यजीद एक उद्दंड और ज़ालिम इंसान था, कुछ लोगों का मत है कि वह शराबी और बद किरदार भी था , बलात्कारी था। दमिश्क के महलों में ऐशो आराम में पला था जिसने इस्लामिक इतिहास में ऐसी चोट दी जिसकी कराह आज 1400 बाद तक सुनाई देती है।
हज़रत इमाम हुसैन का यजीद का विरोध सैद्धांतिक था कि खिलाफत पैगम्बर मुहम्मद ﷺ की विरासत है किसी के बाप की जागीर नहीं कि कोई बाप अपने बेटे को ट्रांसफर कर दे क्योंकि यह इस्लाम की रूह के खिलाफ है।
साल 680 ईस्वी में जब हज़रत मुआविया का इंतकाल हुआ तो यजीद ने सिंहासन पर बैठते ही मदीना के गवर्नर "वलीद बिन उत्बा" को खत लिखा कि वह हुसैन से मेरे नाम की "बैत" अर्थात निष्ठा की शपथ लें अर्थात उनका नेतृत्व स्वीकार करें और यदि वह ऐसा ना करें तो उनका सर क़लम कर दिया जाए....
ज़ालिम यजीद का यह फैसला अपने पिता हज़रत मुआविया की वसीयत के खिलाफ था ..