Wednesday, September 16, 2026

Riots Against Muslims in India

 हैदराबाद ऑपरेशन पोलो में 2,50,000 मुसलमानों का नरसंहार,

1947 में मुसलमानों का नरसंहार जिसमें 5,00000 मुसलमानों का नरसंहार और 3-4 लाख अपनी जान बचाकर पाकिस्तान भाग गए।
फरवरी 1961: जबलपुर दंगे, मध्य प्रदेश - 55 मौतें मुस्लिम आर्थिक नुकसान।
अक्टूबर 1961: अलीगढ़ दंगे, उत्तर प्रदेश - 14 मौतें विश्वविद्यालय कैंपस में हिंदू छात्र की हत्या की अफवाह।
जनवरी 1964: कलकत्ता दंगे, पश्चिम बंगाल - 264 मौतें पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचारों का बदला।
अगस्त 1967: रांची-हटिया दंगे, बिहार - 184 मौतें उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बनाने के खिलाफ आंदोलन।
सितंबर-अक्टूबर 1969: गुजरात दंगे - 512 मौतें दरगाह में।
भिवंडी जलगांव 1970
1964/ 1979 जमशेदपुर
अगस्त 1980: मुरादाबाद दंगे, उत्तर प्रदेश - 400 मौतें; ईदगाह में सुअर बांध दिया गया।
मई 1981: बिहार शरीफ दंगे, बिहार - 45 मौतें
जुलाई 1982: मेरठ दंगे, उत्तर प्रदेश - 100 मौतें मुस्लिम वकील और नगर पालिका के बीच जमीन विवाद।
फरवरी 1983: नेल्ली नरसंहार, असम - 2,191 मौतें (अनौपचारिक 10,000+) बंगाली मुसलमानों का।
मई 1984: भिवंडी दंगे, महाराष्ट्र - 278 मौतें; मस्जिद पर भगवा झंडा लगाने का विवाद।
फरवरी-अगस्त 1985: गुजरात दंगे, अहमदाबाद - 275 मौते आरक्षण पर गुस्सा मुसलमानों पर टूटा।
अप्रैल-मई 1987: मेरठ दंगे - 346 मौतें; बाबरी मस्जिद को हिंदू पूजा के लिए खोलना।
मई 1988: औरंगाबाद हिंसा - 26 मौतें चुनाव परिणामों का विरोध।
अक्टूबर 1988: मुजफ्फरनगर - 37 मौतें BMAC की रैली।
भागलपुर दंगा 24 अक्टूबर 1989 को शुरू हुआ था।
सितंबर 1989: कोटा हिंसा - 26 मौतें धार्मिक जुलूस।
सितंबर 1989: बदायूं हिंसा - 24 मौतें उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का मुद्दा।
अक्टूबर 1989: इंदौर हिंसा - 23 मौतें राजनीतिक रैली।
अक्टूबर 1989: भागलपुर हिंसा - 1,000+ मौतें हिंदू छात्रों की हत्या की अफवाहें
अप्रैल-अक्टूबर 1990: गुजरात हिंसा - 12 मौतें राजनीतिक जुलूस।
अक्टूबर 1990: राजस्थान हिंसा (उदयपुर, जयपुर)
अक्टूबर 1990: हैदराबाद दंगे - 200+ मौतें; बाबरी मस्जिद का आंशिक विध्वंस।
दिसंबर 1990: आगरा दंगे - 22 मौतें; अज्ञात कारण।
दिसंबर 1990-फरवरी 1991: खुर्जा हिंसा - 96 मौतें बाबरी मस्जिद/राम जन्मभूमि मुद्दा।
मार्च 1991: भद्रक दंगे, ओडिशा - 33 मौतें बाबरी मुद्दा।
मार्च 1991: सहारनपुर हिंसा - 40+ मौतें राम नवमी जुलूस को मस्जिद के पास रोकना।
मई 1991: कानपुर हिंसा - 20 मौतें बाबरी विवाद।
मई 1991: मेरठ हिंसा - 30 मौतें चुनावी हिंसा।
अक्टूबर 1992: सूरत दंगे - 200+ मौतें बाबरी विवाद।
दिसंबर 1992-जनवरी 1993: बॉम्बे दंगे - 900 मौतें बाबरी विध्वंस पर विरोध।
दिसंबर 1992: कर्नाटक (बेंगलुरु आदि) - 30 मौतें उर्दू समाचार प्रसारण।
दिसंबर 1992: कानपुर - 254 मौतें बाबरी विध्वंस।
दिसंबर 1992: असम - 90+ मौतें बाबरी विध्वंस।
दिसंबर 1992: राजस्थान - 60 मौतें बाबरी विध्वंस।
दिसंबर 1992: कलकत्ता - 35 मौतें बाबरी विध्वंस।
दिसंबर 1992: भोपाल - 175 मौतें बाबरी विध्वंस।
अक्टूबर 1994: बेंगलुरु - 25 मौतें दूरदर्शन पर उर्दू प्रसारण।
बड़ौदा सूरत 1994
फरवरी-मार्च 2002: गुजरात दंगे - 1,044 मौतें (आधिकारिक), 2,000 अनौपचारिक; गोधरा ट्रेन जलाने की घटना।
मालेगांव 2006
मुजफ्फरनगर 2013
फरवरी-मार्च 2020: दिल्ली दंगे - 53 मौतें CAA-NRC विरोध।
जुलाई-अगस्त 2023: हरियाणा दंगे (नूंह आदि) - 7 मौतें गौ रक्षक जुलूस।
नोट:- 99% दंगे कांग्रेस शासनकाल में हुए हैं। दंगों के जिम्मेदार सत्ता के संरक्षण में बचे रहे।
ज्ञात रहे जिन्हें इस्तेमाल किया गया और बचाया गया, आज वो सत्ता में हैं।
सत्ता शासन ताश कि गड्डी कि तरह भले ही उपर नीचे हो रहा है लेकिन टार्गेट आज मुस्लिम है।
2002 के विश्वव्यापी किरकिरी के बाद इन लोगों ने पैटर्न बदल दिया था। 2004 में सत्ता में आई कांग्रेस गुजरात दंगों के गुनाहगारों को बढ़े और ताकतवर होने दी।
वहीं दूसरी तरफ सीधे खून-खराबा छोड़कर इस्लामोफोबिया ने बेगुनाहगार बच्चों को जेल में सड़ाना शुरू किया।
नंगी और बिकाऊ मीडिया अपने 100% ब्राह्मणवाद के साथ रोज मुसलमानों का राजनीतिक सामाजिक आर्थिक चीरहरण करती रही।
इस्लामोफोबिया से ग्रस्त गृहमंत्री अपने काम में लगे रहे।
क्या चिदंबरम क्या पाटिल।
उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए एन आर सी आया, मोबलिंचिंग आया, न्यायालयों में बेतुके फैसले आने शुरू हुए, लैंड जिहाद, एस आई आर आया, बुल्डोजर आया।
सनद रहे गाजा वालों को जनसंहार न्याय चाहने के लिए यूएन के कोर्ट में केस लगाना चाहिए। और सही फैसले के लिए लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था में अटूट विश्वास रखना चाहिए।
लड़ाई कागज़ी ही लड़नी चाहिए क्योंकि आखिर में कागज ही काम आती है।
क्योंकि बुजुर्गों ने बंदूक रखकर कागज़ कलम पकड़ लिया था।
शांति के लिए हथियारों का संतुलन होना जरूरी नहीं है कागजों कि फेहरिस्त होना जरूरी है।

Friday, September 4, 2026

Level of Discourse in Saffron Times

  

1..सोनिया गांधी ‘वेश्या’ थीं. स्कॉट एजेंसी के लिए काम करती थीं.
– सुब्रमण्यन स्वामी
#2. प्रियंका गांधी वाड्रा ‘शराबी’ हैं. वो बहुत शराब पीती हैं और बदनाम हैं.
– सुब्रमण्यन स्वामी
#3. गांधी ‘चतुर बनिया’ थे.
– अमित शाह
#4. सोनिया गांधी ‘जर्सी गाय’ हैं. राहुल ‘हाइब्रिड’ बछड़ा हैं.
– नरेंद्र मोदी
#5. वाह क्या गर्लफ्रेंड है? आपने कभी देखा है 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड को?
– नरेंद्र मोदी (सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर के लिए)
#6. (मनमोहन सिंह) रात के चौकीदार हैं, जो गांधी परिवार के लिए गद्दी गर्म रख रहे हैं.
– नरेंद्र मोदी
#7. नीतीश कुमार के डीएनए में प्रॉब्लम है.
– नरेंद्र मोदी
#8. मुझे हैरानी है कि शैतान को प्रवेश करने के लिए उनका (लालू) ही शरीर मिला. पूरी दुनिया में लालू का ही पता मिला शैतान को?
– नरेंद्र मोदी
#9. मायावती जी एक वेश्या से भी ‘बदतर चरित्र’ की हो गई हैं.
– दयाशंकर सिंह
#10 .दिल्ली के लोगों को तय करना है. रामजादों की सरकार चाहिए कि हरामजादों की.
– निरंजन ज्योति
#11. सोनिया गांधी ‘इटली की गुड़िया’ हैं. ‘जहर की पुड़िया’ हैं.
– अश्विनी चौबे
#12. सोनिया गांधी ‘पूतना’ हैं. राहुल ‘विदेशी तोता’ हैं.
– अश्विनी चौबे
#13. लालू यादव और नीतीश कुमार ‘रंगा बिल्ला’ (कुख्यात अपराधी) हैं.
– अश्विनी चौबे
14. गोरे रंग के कारण सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी हैं.
– गिरिराज सिंह
#15. पंखुड़ी जी, ज्यादा पंख मत फरफराइए. ऐसी बात बोलूंगा कि शर्मसार हो जाओगी.
– प्रेम शर्मा (समाजवादी पार्टी की एक महिला प्रवक्ता से)
#16 . हम समझ नहीं सकते कि ममता बनर्जी पुरुष हैं या महिला हैं. मैं तो कहूंगा कि वह किन्नर बन गई हैं, जिन्हें आप ट्रेनों और बसों में देखते हैं.
– श्यामपद मोंडल
ये हैं बीजेपी के एक और सीरियल ऑफेन्डर. इनका बोलने पर कोई बस नहीं. शुरू करते हैं तो कुछ भी ऊल-जुलूल बकते हैं.
#17 . मैं कहता हूं कि राहुल गांधी पागल हो गए हैं.
– साक्षी महाराज
#18.डिस्कवरी चैनल वाले ऐसे हाथी को खोज रहे हैं, जो अंडा देता हो.
– नरोत्तम मिश्रा (BSP पर टिप्पणी करते हुए)
#19. जब मनमोहन सिंह अमेरिका जाते थे, तो ‘ऐरे-गैरे’ मंत्री उन्हें रिसीव करने जाते थे.
– गुलाबचंद कटारिया
20.मनमोहन सिंह तो बाथरूम में रेन कोट पहनकर नहाते हैं
21..सोनिया छठ पूजा नही करती इसलिए मंदबुद्धि बेटा पैदा किया
मनोज तिवारी
22..दीदी! ओ दीदी!
नरेंद्र मोदी
स्रोत--लल्लन टॉप
नोट--लिस्ट और लम्बी हो सकती है। इतनी अभद्रता के बाद ये लोग किसी छुटभैया आदमी की गाली को आधार बनाकर भाषा की बात करते हैं तो मुझे डेढ़ इश्किया का अरशद वारसी का डायलॉग याद आता है--
" वाह खालू तुम्हारा प्यार प्यार और हमारा प्यार सेक्स।"

Jo Yad Hai (Mohd Zahi's Words)

 "स्वतंत्र भारद्वाज" अकेला उदाहरण नहीं है, माया कोडनानी , बाबू बजरंगी , जयदीप पटेल, प्रह्लाद गोसा , दयाभाई पटेल समेत गुजरात दंगों के 67 प्रमुख आरोपी ऐसे ही सत्ता के सहारे बचाए गए।

एहसान जाफरी को ज़िंदा जला देने वाले बिपिन पटेल और पुलिस निरीक्षक के जी एर्दा , सब बाइज्जत बरी हो गए। बेस्ट बेकरी जलाकर 14 मासूमों को खाक कर देने वाले सभी बरी हो गए।
और यही क्यों? बाबरी मस्जिद को शहीद करने वाले... ?
वो बिल्किस बानो के 11 सज़ायाफ़्ता बलात्कारी ? याद करिए।
मज़ेदार बात यह है कि "स्वतंत्र" की तरह इन्होंने भी कैमरे के सामने और मंच से अपने अपने अपराध गर्वोन्नत होकर स्वीकार किए...
यह संघ का टेस्टेड माडल है.

Friday, July 24, 2026

We Remember It

 20 दिसंबर 2019

मेरठ में नागरिकता संशोधन कानून (CAA)
और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ
विरोध प्रदर्शन चल रहा था…
नाम आसिफ़, उम्र 20 साल
आसिफ़ ई-रिक्शा चलाने के लिए
सुबह 10 बजे घर से निकले थे
लेकिन ख़बर आई कि आसिफ़ को गोली लगी है
गोली बिल्कुल दिल के पास मारी गई थी,
जो सीने को चीरते हुए कमर से निकल गई…
ऐसा कैसे हो सकता है
कि गोली सैकड़ों मीटर दूर से चलाई जाए
और शरीर के आर-पार हो जाए?
दूसरा नाम मुहम्मद आसिफ़,
उम्र 33 साल
टायर वालों के यहाँ मज़दूरी करता थे
4 बच्चों के पिता थे
घर के अकेला कमाने वाले थे
परिवार किराए के घर में रहता था…
आसिफ़ नमाज़ पढ़कर घर आ रहा थे…
आसिफ़ को गोली पीठ में लगी,
जो सीने की तरफ़ से बाहर निकल गई
फिर वही सवाल…
गोली दूर से मारी गई या बिल्कुल क़रीब से?
तीसरा नाम ज़हीर,
उम्र 45 साल
भैंसों के चारे की मज़दूरी करते थे
काम से वापस घर लौटे रहे थे
पुलिस ने गोली मारी,
कनपटी पर लगी और आर-पार हो गई
फिर वही सवाल…
गोली दूर से मारी गई या बिल्कुल क़रीब से?
चौथा नाम अलीम,
उम्र 23 साल
रोटी बनाने का काम करते थे
कोतवाली के पास एक होटल था,
वहीं अलीम रोटी बनाया करता थे
पुलिस ने दोपहर में ही वह होटल बंद करवा दिया था
अलीम घर लौट रहे थे
उसी वक़्त उनके सिर के पिछले हिस्से में गोली मारी गई,
जिसकी वजह से पीछे से सिर बुरी तरह फट गया था
फिर वही सवाल…
गोली दूर से मारी गई या बिल्कुल क़रीब से?
पांचवां नाम मोहसिन,
उम्र 30 साल
दो बेटों का बाप थे
एक बेटा चार साल का
और दूसरा छह महीने का
भैंसों का चारा लेने गुलज़ार इब्राहिम गली से निकला ही थे
कि पुलिस ने उसी जगह बिल्कुल दिल पर गोली मारी,
जिसकी वजह से पीठ की खाल तक फट गई…
फिर वही सवाल…
गोली दूर से मारी गई या बिल्कुल क़रीब से?
इन पांचों लोगों में कुछ बातें कॉमन थीं।
मज़दूर तबके से थे…
प्रोटेस्ट में शामिल ही नहीं थे…
और सबसे अहम बात यह थी
कि पुलिस प्रशासन ने पांचों की मय्यत को
उनके घर ले जाने नहीं दिया
पांचों की मृत शरीर को दफन करने के लिए
प्रशासन द्वारा इस शर्त पर दी गई
कि शव को सीधा कब्रिस्तान ले जाओगे…
अगर आप उस वक़्त
इस दहशतगर्दी का
सड़कों पर आकर विरोध करते,
तो शायद आज दिल्ली की सड़कों पर
आपका खून न लगा होता…
अल्लाह हमारे शहीदों को जन्नत-उल-फिरदौस में जगह दे…आमीन!
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