कर्बला:- दूसरा भाग
बात समझनी है तो गौर से पूरी पढ़नी होगी
इस्लाम के चौथे ख़लीफा हज़रत अली रज़ी• जो पैगंबर मुहम्मद ﷺ के दामाद व चचेरे भाई थे वह ख़लीफा के तौर पर कूफा (इराक़) में शासन कर रहे थे।
36 हिजरी अर्थात 657 ईस्वी में एक युद्ध हज़रत अली रज़ि• और तत्कालीन शाम (सीरिया) के गवर्नर मुआविया इब्न अबू सुफियान के बीच लड़ा गया। यह युद्ध कूफा (इराक) के यूफ्रट्स (फरात) नदी के किनारे स्थित "सिफ्फीन' नामक स्थान पर हुआ।
दरअसल इस्लाम के तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान इब्न अफ्फान रज़ी• की 35 हिजरी (656 ईस्वी) में शहादत के बाद मुस्लिम समुदाय में गहरे मतभेद पैदा हो गए।
कुछ विद्रोहियों ने हज़रत उस्मान पर शासन में भाई-भतीजावाद और अन्याय का आरोप लगाया था, जिसके कारण उनकी शहादत हुई और हज़रत अली रज़ि• को ख़लीफा चुना गया, इसके बाद कुछ लोगों का मानना था कि हज़रत उस्मान रजि• के हत्यारों को तुरंत सजा नहीं दी गई, जिससे असंतोष बढ़ा।
शाम (सीरिया) के तत्कालीन गवर्नर मुआविया, हज़रत उस्मान के रिश्तेदार (उमय्यद वंश से) ने हज़रत अली की खलीफा के रूप में वैधता पर सवाल उठाया और उन्होंने मांग की कि हज़रत उस्मान रजि• के हत्यारों को सजा दी जाए, और जब तक यह नहीं होता, वे हज़रत अली रजि• की बैअत (निष्ठा) स्वीकार नहीं करेंगे।
मुआविया ने शाम (सीरिया) में अपनी सैन्य और राजनीतिक शक्ति का उपयोग करके हज़रत अली रजि• के खिलाफ विद्रोह शुरू किया। हज़रत अली का केंद्र कूफा (इराक) था, जबकि मुआविया का शाम (सीरिया) में मजबूत आधार था।
36 हिजरी में हज़रत अली रजि• ने मुआविया के विद्रोह को दबाने के लिए कूफा से अपनी सेना के साथ सिफ्फीन की ओर कूच किया। और उधर मुआविया भी अपनी सेना के साथ सिफ्फीन पहुँचे।
दोनों पक्षों के बीच कई महीनों तक छोटे-मोटे संघर्ष और बातचीत हुई मगर मुख्य युद्ध सफर 36 हिजरी (जुलाई 657 ईस्वी) में शुरू हुआ जिसे "जंग-ए-सिफ्फीन" कहा जाता है।
हज़रत अली की सेना में मलिक अल-अश्तर जैसे वफादार कमांडर थे, जबकि मुआविया की सेना का नेतृत्व अम्र इब्न अल-आस जैसे रणनीतिकारों ने किया।
कई दिनों तक भयंकर लड़ाई हुई। हज़रत अली की सेना ने मुआविया की सेना पर बढ़त हासिल कर ली थी, और ऐसा लग रहा था कि मुआविया की हार निश्चित है।
जब मुआविया की सेना हार के कगार पर थी, अम्र इब्न अल-आस ने एक रणनीति अपनाई। उन्होंने अपने सैनिकों को कुरआन की आयतें भालों पर टांगकर युद्ध रोकने की मांग की और मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा।
कुरान की आयतों के हवाले के कारण हज़रत अली रजि• ने अनिच्छा से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया, क्योंकि वह मुस्लिम खूनखराबे को रोकना चाहते थे।
मध्यस्थता के लिए हज़रत अली रजि• की ओर से अबू मूसा अशअरी और मुआविया की ओर से अम्र इब्न अल-आस को चुना गया मगर मध्यस्थता में कोई स्पष्ट परिणाम नहीं निकला बल्कि वक्त मिला और मुआविया ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली।
इसका परिणाम यह निकला कि युद्ध में जीत के मुहाने पर खड़ी हज़रत अली रजि• की सेना का एक हिस्सा बागी हो गया, जो बाद में खारिजी (Kharijites) के रूप में जाना गया।
उन्होंने हज़रत अली और मुआविया दोनों का विरोध किया। हज़रत अली ने बाद में खारिजियों के खिलाफ जंग-ए-नहरवान (37 हिजरी, 658 ईस्वी) लड़ी।
मध्यस्थता के असफल होने के बाद मुआविया ने स्वयं को खलीफा घोषित किया, जिससे इस्लामी दुनिया में दो समानांतर शक्तियाँ उभरीं और यहीं से इस्लाम के मानने वालों में दो अलग-अलग धाराएं पैदा हुईं 1- शिया 2- सुन्नी
और यह धाराएं इस्लाम के शुरुआती चार खलीफाओं के चयन को भी अपने अलगाव की लपेट में ले गयीं।
सुन्नी मानते हैं कि पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने अपने बाद के नेता (खलीफा) के लिए कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया बल्कि हज़रत अबू बक्र को नमाज़ में इमामत के लिए कहा , इसे अगले खलीफा का सुन्नी संकेत मानते हैं।
वह मानते हैं कि खलीफा का चयन शूरा (परामर्श) के माध्यम से होना चाहिए और सुन्नी चार राशिदुन खलीफाओं 1- हज़रत अबू बक्र रज़ि•, 2-हज़रत उमर रज़ी• 3-हज़रत उस्मान रज़ि• और 4-हज़रत अली रज़ि• को वैध मानते हैं और उनके नेतृत्व को स्वीकार करते हैं।
शिया मुसलमान मानते हैं कि पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने हज़रत अली रज़ी• को ग़दीर-ए-ख़ुम की घटना में अपना उत्तराधिकारी (इमाम) नियुक्त किया था इसलिए हज़रत मुहम्मद ﷺ के बाद पहला ख़लीफा उन्हें होना चाहिए जो नहीं बनाया गया।
शिया लोग मानते हैं कि इमामत (आध्यात्मिक और राजनीतिक नेतृत्व) केवल पैगंबर के परिवार (अहल-ए-बैत) के सदस्यों में रहनी चाहिए, जो हज़रत अली और उनकी संतान से शुरू होती है।
इसलिए शिया समुदाय इन तीनों 1- हज़रत अबू बक्र रज़ि•, 2-हज़रत उमर रज़ी• 3-हज़रत उस्मान रज़ि• को वैध खलीफा नहीं मानता और हज़रत अली• को ही इस्लाम का पहला ख़लीफा मानता है, जबकि सुन्नी समुदाय चारों खलीफाओं को वैध मानते हैं। हज़रत अली रजि• भी उनके लिए बहुत इज़्ज़त के काबिल हैं क्योंकि वह हज़रत मुहम्मद ﷺ के चचाज़ात भाई और दामाद भी थे।
खैर.. हज़रत अली रज़ि• और मुआविया समझौते के बाद बंटी हज़रत अली रजि• की सेना के एक भाग खारिजियों में से एक व्यक्ति, अब्दुर्रहमान इब्न मुल्जिम, ने हज़रत अली की हत्या की योजना बनाई।
रमज़ान को सुबह की नमाज़ के लिए हज़रत अली रजि• कूफा की मस्जिद-ए-कूफा में गए। नमाज़ के दौरान या जब वह मस्जिद में प्रवेश कर रहे थे, इब्न मुल्जिम ने उन पर तलवार से हमला किया। उसने हज़रत अली रजि• के सिर पर ज़हरीली तलवार से वार किया, जिससे गहरी चोट लगी।
हज़रत अली रजि• इस हमले के बाद कुछ दिन तक ज़िंदगी और मौत से जूझते रहे, लेकिन 23 रमज़ान 40 हिजरी को वह शहीद हो गए। उनकी शहादत के बाद उन्हें नजफ (इराक) में दफनाया गया, जहां आज उनकी मज़ार "रौज़ा-ए-हज़रत अली" है। जो शिया और सुन्नी दोनों के लिए एक पवित्र स्थल है।
हज़रत अली रज़ी• की शहादत के बाद 40 हिजरी (661 ईस्वी) में उनके बेटे हज़रत हसन इब्न अली रज़ी• खलीफा बने।
हज़रत हसन का खलीफा बनना इस्लामी इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी। हज़रत हसन ने लगभग छह महीने तक खलीफा के रूप में शासन किया। इसके बाद उन्होंने शांति और एकता के लिए मुआविया इब्न अबी सुफियान के साथ एक समझौता किया और खलीफा का पद छोड़ दिया।
इस समझौते के परिणामस्वरूप, मुआविया इब्न अबी सुफियान उमय्यद वंश के पहले खलीफा बने, जिससे उमय्यद खलीफा की शुरुआत हुई।
यह घटना इस्लामी इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने शिया और सुन्नी मतभेदों को और गहरा किया।
दरअसल हज़रत हसन इब्न अली रजि• और मुआविया इब्न अबी सुफियान के बीच 41 हिजरी (661 ईस्वी) में 6 मुद्दे पर समझौता हुआ उसे इतिहास में "हसन-मुआविया समझौता" के नाम से जाना जाता है जिसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय में एकता बनाए रखना और गृहयुद्ध को रोकना था।
हालांकि, शिया और सुन्नी में इन शर्तों के विवरण में कुछ भिन्नताएं मिलती हैं , मगर ऐतिहासिक रूप से यह शर्तें थीं 1- हज़रत हसन रजि• ने खलीफा का पद मुआविया को सौंपने पर सहमति जताई, जिससे मुआविया मुस्लिम उम्माह के खलीफा बन गए। यह शर्त जंग-ए-सिफ्फीन और उसके बाद की अशांति को समाप्त करने के लिए थी।
2- मुआविया ने वचन दिया कि वह मुस्लिम समुदाय के साथ न्याय और इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार शासन करेगा। इसमें सभी मुसलमानों, चाहे वे किसी भी समूह (शिया, सुन्नी, या अन्य) से हों के साथ समान व्यवहार करना शामिल था।
3- समझौते में यह शर्त थी कि हज़रत अली रज़ी• के परिवार, समर्थकों, और शिया अनुयायियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। उनकी सुरक्षा और सम्मान की गारंटी दी गई।
4- हज़रत अली रजि• के खिलाफ मस्जिदों में या सार्वजनिक रूप से अपमानजनक भाषा (जैसे लानत या शाप देना) का उपयोग नहीं किया जाएगा।
5- कुछ स्रोतों के अनुसार, मुआविया ने हज़रत हसन रजि• और उनके परिवार के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने का वादा किया। इसमें कूफा और अन्य क्षेत्रों से प्राप्त राजस्व का एक हिस्सा और हज़रत हसन रज़ि• को मदीने में शांति से रहने की अनुमति शामिल थी।
6- कुछ तथ्य यह भी हैं कि हज़रत हसन रजि• ने यह शर्त रखी थी कि मुआविया के बाद खलीफा का चयन शूरा (परामर्श) के माध्यम से होगा, न कि वंशानुगत तरीके से।
हालांकि कुछ सालों बाद ही हज़रत हसन रजि• 49 हिजरी (669-670 ईस्वी) में मदीना में इंतकाल कर गये। तमाम मत है कि उन्हें ज़हर दिया गया , शिया मत है कि उन्हें मुआविया ने धोखे से ज़हर दिलाकर शहीद किया।.
मुआविया ने हज़रत हसन रज़ि• के इंतेकाल के बाद में अपने बेटे यज़ीद "वली ए अहद" नियुक्त किया और हसन- मुआविया समझौते को तोड़ दिया और 680 ईस्वी में अपने पिता मुआविया के इंतकाल के बाद यजीद ने सत्ता संभाली और हज़रत हुसैन रजि• ने इसे स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।
यजीद ने सत्ता संभालते ही अपने पिता की वसीयत तोड़ दी और मदीना के गवर्नर और अपने चचेरे भाई वलीद इब्न उत्बा इब्न अबी सुफियान को हुक्म जारी किया कि "हुसैन से मेरे नाम की "बैत" अर्थात निष्ठा की शपथ लें और यदि वह ऐसा ना करें तो उनका सर क़लम कर दिया जाए....
एक तरफ मुआविया की वसीयत हुसैन को माफ़ कर देने की थी तो यजीद इसे तोड़ कर अपने पहले ही हुक्म में हुसैन के सर क़लम का हुक्म सुना रहा था। आदेश मदीना पहुंचते ही हलचल और बेचैनी शुरू हो गई।
मदीना के गवर्नर वलीद इब्न उत्बा इब्न अबी सुफियान ने हुसैन को अपने अपने महल में बुलाकर हुसैन को यजीद का हुक्म सुनाया।
हुसैन समझ गये कि अब शांति मुश्किल है। वह अपने नाना पैगंबर मुहम्मद ﷺ के शहर मदीना में ख़ून ख़राबा नहीं होने देना चाहते थे इसलिए उन्होंने गवर्नर से सोचने के लिए कुछ वक्त मांगा और उसी रात मदीना छोड़कर अपने परिवार के साथ मक्का चले गए जहां इस्लाम का सबसे पवित्र शहर होने के कारण किसी भी तरह के खून खराबे की मनाही थी।
हुसैन मक्का पहुंचे और यजीद का हुक्म चारों तरफ़ फैल गया, कूफा शहर से हुसैन को हज़ारों खत का सैलाब उनके समर्थन में आने लगे कि "ऐ पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के नवासे आप कूफा आईए और हमारे इमाम बनें, हम यज़ीद की ज़ालिम हुकूमत के खिलाफ आपका साथ देंगे"
हुसैन शुरू में सशंकित थे क्योंकि यही वह लोग थे जिन्होंने हज़रत अली रजि• का साथ आखिरी वक्त में छोड़ कर चले गए थे। मगर खतों का सिलसिला लगातार आना जारी रहा..और हालात का जायज़ा लेने के लिए उन्होंने अपने चचेरे भाई मुस्लिम बिन अकील को कूफ़ा भेज दिया।
मुस्लिम बिन अकील जब कूफ़ा पहुंचते हैं तो उनका हज़ारों लोगों ने स्वागत किया और यजीद के खिलाफ हुसैन का समर्थन किया और देखते ही देखते 12 हजार लोगों ने इमाम हुसैन के नाम की शपथ ले ली इससे मुस्लिम बिन अकील को यकीन हो गया कि कूफ़ा में क्रांति और यज़ीद के खिलाफ विद्रोह की ज़मीन तैयार है।
मुस्लिम बिन अकील ने हुसैन को पत्र लिखा कि यहां आ जाईए यज़ीद के खिलाफ पूरी एक फौज तैयार है आप चले आईए। कूफ़ा हज़रत अली का शहर था हुसैन ने फैसला किया और कूफ़ा जाने के लिए तैयार हो गये।
यज़ीद की ख़िलाफत का जिन 4 लोगों ने हुसैन के साथ विरोध किया 1-अब्दुल रहमान इब्ने अबू बक्र 2-अब्दुल्ला इब्ने उमर 3- ज़ुबैर इब्ने ज़ुबैर 4- अब्बास अब्दुल्ला इब्ने अब्बास ...
अब्दुल्ला इब्ने अब्बास ने उन्हें कूफ़ा जाने से रोकने की बहुत कोशिश की...वह दौड़ते जा रहे थे कि हुसैन खुदा के लिए कूफ़ा मत जाओ , कूफ़ा वाले तुम्हारा साथ नहीं देंगे, "अल कूफ़ी ला यूफ़ी" अर्थात कूफ़ी वफ़ा नहीं करता। और अगर जाना ही है तो अपने घर और परिवार को साथ मत ले जाओ...
मगर यज़ीद से जंग की कैफियत में हुसैन रजि• ने सारी बातों नज़र अंदाज़ कर दिया और कूफ़ा की तरफ़ चल दिए , जहां मुस्लिम बिन अकील के साथ हज़ारों लोग हुसैन का इंतजार कर रहे थे।
यज़ीद को कूफ़ा में विद्रोह की खबर मिली तो उसने कूफा का गवर्नर उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद को नियुक्त कर दिया। कूफा पहुँचने पर उबैदुल्लाह ने कूफा के लोगों को डराया-धमकाया, मारा पीटा जिसके कारण हज़रत हुसैन के सभी समर्थकों ने मुस्लिम इब्न अकील का साथ छोड़ दिया।
मुस्लिम इब्न अकील को उबैदुल्लाह के आदेश पर गिरफ्तार कर सर क़लम कर के शहीद कर दिया गया। शहीद होने के पहले मुस्लिम इब्ने अकील ने हुसैन को किसी तरह खबर पहुंचाई कि कूफ़ा मत आना, यहां के लोगों ने तुमसे और मुझसे झूठ बोला और गद्दारी की है।
इधर मुस्लिम इब्ने अकील के पहले खत के मिलते ही हुसैन अपने परिवार के साथ मक्का से कूफ़ा के लिए निकल पड़े थे , पहले खत में उन्हें कूफ़ा बुलाया गया था। रास्ते में उन्हें मुस्लिम इब्ने अकील की शहादत और कूफ़ा के लोगों की बेवफाई की ख़बर मिली।
इसके बाद हुसैन के काफिले में साथ रहे सभी लोग उन्हें छोड़ कर चले गए और हुसैन के साथ बचे सिर्फ 72 वफादार साथी जिन्होंने हुसैन से मक्का वापस लौटने की गुजारिश की मगर हुसैन ने कहा कि अब बहुत देर हो चुकी है, जो होना होगा वही होगा।
इराक की सीमा में दाखिल होते ही हुसैन को सेना की एक टुकड़ी ने घेर लिया, इस टुकड़ी का कमांडर हुर इब्ने यज़ीद था। हुर एक सम्मानित सैनिक था।
वह पैगंबर मुहम्मद ﷺ के नवासे पर हाथ नहीं उठाना चाहता था तो उसने कूफ़ा में हुसैन के लिए खतरा देखते हुए उनका काफिला कूफ़ा से मोड़कर एक बंजर ज़मीन की तरफ मोड़ दिया और साल सन 680 में मुहर्रम की दूसरी तारीख को हुसैन कर्बला के मैदान में पहुंच गए।
अगले दिन कूफा का गवर्नर उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद के हुक्म पर 4.0 हजार सैनिकों की एक और फौज कर्बला पहुंच गई जिसका कमांडर था शिम्र इब्न ज़िलजोशन जिसने सबसे पहले हुसैन के लोगों के लिए फरात नदी का पानी बंद कर दिया।
हुसैन के खेमे के औरतें और बच्चे तीन दिनों तक कर्बला के रेगिस्तान की तपती गरमी में प्यासे तड़पते रहे।
और मुहर्रम की दसवीं तारीख अर्थात जिसे असूरा का दिन कहते हैं जंग शुरू हुई। एक तरफ हुसैन के 72 साथी तो दूसरी तरफ यज़ीद की 4000 सैनिकों की फ़ौज... यह जंग नहीं बल्कि एकतरफा नरसंहार था।
हुसैन ने तय किया कि इन 72 लोगों में से एक एक लोग मैदान में जाएंगे और अपनी शहादत देंगे और सबसे पहले गये हुसैन के 18 साल के बेटे अली अकबर...वह लड़ते हुए शहीद हो गए।
इसके बाद हुसैन के भाई अब्बास की बारी आई जो खेमें के बच्चों और औरतों की लगातार प्यास से परेशान थे। वह अपनी मशक लेकर फ़रात नदी पहुंचे पानी भरा कि यज़ीद की सेना ने उन्हें घेर लिया और उनके दोनों हाथों को काट दिया फिर भी उन्होंने अपने दांतों से मशक पकड़ कर खेमे तक लाने की कोशिश की मगर एक तीर आकर मशक में लगा और अब्बास वहीं शहीद हो गए।
दोपहर होते-होते हुसैन के सारे साथी शहीद हो गए और तब हुसैन अपने 6 महीने के बच्चे अली असगर को लेकर यज़ीद की फोज के सामने खड़े हो गए और कहा कि तुम्हारी दुश्मनी मुझसे है , इस बच्चे से क्या दुश्मनी, कम से कम इस बच्चे को तो पानी दे दो , तभी एक तीर अली असगर के सूखे गले में आकर लगा और पानी से सूखा गला ख़ून से तरबतर हो गया..6 महीने के अली असगर हुसैन के हाथों में ही शहीद हो गये।
अब हुसैन पूरी तरह अकेले हो गये और अपनी तलवार "ज़ुल्फ़िकार" लेकर मैदान में आ गये , सामने 4000 की फौज़ , चारों तरफ़ से उनपर आते तीर और हुसैन का छलनी शरीर , घायल होकर हुसैन ज़मीन पर गिरे और हज़रत मुहम्मद ﷺ के नवासे , फातिमा और अली के बेटे हुसैन का सर यजीद की सेना के कमांडर शिम्र इब्न ज़िलजोशन ने अपनी तलवार से क़लम कर दिया।
इसके बाद यज़ीद की सेना ने औरतों और बच्चों को लूटा उन्हें कैद कर दिया गया और खेमें में आग लगा दी गई। इसके साथ ही कर्बला का युद्ध खत्म हो गया।
शिम्र इब्न ज़िलजोशन ने हुसैन के कटे हुए सर को कूफा का गवर्नर उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद के सामने पेश किया , उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद ने छड़ी को हुसैन के कटे हुए सर के आंखों में घुसाया, दांतों और होंठों को चोट पहुंचाई उन्हें अपनी छड़ी से कुरेदने लगा।
उसी दरबार में पैगम्बर मुहम्मद ﷺ के वक्त के एक बुजुर्ग थे जो ऐसा होता देख चीख कर रो पड़े और बोले "कि बंद करो यह सब , मैंने इन्हीं होंठों को हज़रत मुहम्मद ﷺ के गालों को चूमते देखा है"
यजीद द्वारा हज़रत मुहम्मद ﷺ के नवासे हुसैन और उनके परिवार के साथ हुए ऐसे ज़ालिमाना व्यवहार से अरब मुल्कों सनसनी फैल गई और यजीद के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा हो गया।
यजीद ने खुद को बचाने के लिए यह कहा कि उसका इरादा हुसैन को कत्ल करने का नहीं बल्कि सिर्फ बैत अर्थात निष्ठा की शपथ के लिए था। हुसैन के सर क़लम की बात सिर्फ एक धमकी थी। इसका असली गुनहगार कूफ़ा का गवर्नर उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद है।
हालात को काबू में करने के लिए यजीद ने हुसैन के परिवार की बची औरतों को अपने महल में रखा , और कुछ दिन बाद उन्हें मदीना भेज दिया। इन लोगों के मदीना पहुंचते और हुसैन के कत्लेआम का सारा मंज़र सुनते ही मदीना के लोगों ने यज़ीद के खिलाफ बग़ावत कर दी जिसे दबाने के लिए हज़रत मुहम्मद ﷺ के शहर मदीना पर यज़ीद ने आक्रमण कर दिया और मदीना में अपने सैनिकों को लूट कत्लेआम और बलात्कार की खुली छूट दे दी।
यह कर्बला के बाद यज़ीद की दूसरी सबसे बड़ी ग़लती थी , इसके बाद मक्का में यज़ीद के खिलाफ बग़ावत शुरू हुई और इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का पर भी यज़ीद ने आक्रमण कर दिया जिससे काबा को भारी क्षति पहुंची...यह यजीद का तीसरा सबसे घिनौना काम था।
मक्का पर आक्रमण के दौरान ही 35 साल 8 महीने की उम्र में यज़ीद की अचानक मौत हो गयी और उसकी 3 साल 8 महीने की ख़िलाफत खत्म हुई।
इस्लाम के सुनहरे इतिहास में यज़ीद एक काला धब्बा है जिससे शिया और सुन्नी सभी नफ़रत करते हैं, इसके बावजूद कि वह इस्लाम का ख़लीफा था...इसके बावजूद कि आपने किसी मुसलमान का नाम यज़ीद नहीं देखा होगा....
स्पष्टीकरण:- कर्बला से संबंधित हमारे दोनों लेख शिया या सुन्नी के किसी मत के आधार पर ना होकर महान लेखिका Lesaly Haselton की रिसर्च आधारित पुस्तक "After the prophet" पर आधारित है .