Thursday, July 16, 2026

Summary of Riots by Mohd Zahid

 ज़ुल्म की इंतेहा:-

इतना तो तय है कि यह देश अब वैसा नहीं रह गया जैसे देश में रहने के लिए हमारे पुरखों ने "निज़ाम ए मुस्तफा" के नारे पर बने पाकिस्तान को अपने जूतों से ठुकरा दिया था।।।
सांप्रदायिक दंगें उसके पहले भी हुए थे...
सन 1893 बंबई दंगे ,1917 के शाहाबाद, 1921 के मोपला (मालाबार) दंगे, 1923–1927 तक लगातार 4 साल तक उत्तर प्रदेश में अनेक सांप्रदायिक दंगे, 1926 के कलकत्ता दंगे 1935 के कराची, पंजाब, बंबई, मद्रास, संयुक्त प्रांत आदि में कई सांप्रदायिक दंगे , 1946 में ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स , 1946 में नोआखाली हिंसा , 1946 में बिहार दंगे 1946 गढ़मुक्तेश्वर दंगे।
1893 से लेकर 1947 तक इन सांप्रदायिक दंगों में ही एकीकृत भारत में लगभग 30000 लोग मारे गए... मगर निश्चित रूप से आज जैसी स्थिति नहीं थी तभी तो हमारे पुरखों ने "निज़ाम ए मुस्तफा" के जिन्ना के वादे की बजाय नेहरू गांधी की अपील पर भरोसा किया....
आज शायद वैसा विकल्प हो तो निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता कि क्या वैसा फैसला लिया जा सकता है? शायद अब भी हां मगर शायद पहले जैसा आसान ना हो ...
तब 1857 की गदर के बाद जब देश को स्वतंत्र कराने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने एक होकर ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया था इसके बाद ही अंग्रेजों ने समझ लिया कि इस देश में बिना हिंदू को मुस्लिम से लड़ाए लंबे समय तक शासन नहीं किया जा सकता....
परिणाम स्वरूप देश में 1893 से 1947 तक लगातार दंगे होते रहे , लोग मरते रहे फिर भी आज जैसी स्थिति नहीं थी... आज इंसान से अधिक उसकी पहचान और भविष्य मारा जा रहा है जिससे उसकी नस्लें बर्बाद हो जाएं।
आज की स्थिति बहुत भयावह है , आप मुसलमानों की एक युनिवर्सिटी नहीं देख सकते, मुसलमानों की एक ताकतवर आवाज नहीं सुन सकते, कहीं उर्दू नाम नहीं देख सकते, कहीं टोपी दाढ़ी नहीं देख सकते, मदरसा, मस्जिद और कब्रिस्तान नहीं देख सकते....
ऐसा पहले नहीं था, दंगे थे , लोग मारे भी गए मगर बौध्दिक, ऐतिहासिक और धार्मिक मामलों पर आक्रमण नहीं होते थे, तब गांधी थे , दंगों में मरहम लगाने लोगों के बीच में आ जाते थे, आज कोई गांधी कहां? गांधी खड़े हो जाते थे मुसलमानों में तमाम ज़ख्म के बावजूद विश्वास पैदा हो जाता था, हिम्मत आ जाती थी।
आज वह गांधी कहां हैं? देश के बड़े बड़े नेताओं को मुसलमान शब्द कहने में डर लगता है कि कहीं उनका शेष वोट बैंक नाराज़ ना हो जाए , देश के एक बड़े नेता को कहना पड़ता है कि ज़ुल्म हो तो अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ना कह कर "मुसलमानों पर ज़ुल्म" कहो...
महात्मा गांधी ने अल्पसंख्यक नहीं कहा था, सीधे खड़े होकर मुसलमान कहा था....तब हमारे पुरखों ने उनपर भरोसा किया...अब सबकुछ बदल गया है...
मौलाना मुहम्मद अली जौहर युनिवर्सिटी को 15 दिन में लगभग पूरा गिराने का आदेश जारी हुआ है, यह अत्याचार की चरम सीमा है.... एक व्यक्ति से बदला लेने के लिए वहां पढ़ रहे 3-4 हज़ार बच्चों का भविष्य बर्बाद किया जा रहा है... जबकि इसी देश में कंपोजीशन लेकर भवन निर्माण की अनियमितता को प्रमाणित किए जाने का भी कानून है...
कभी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर आक्रमण, कभी जामिया मिल्लिया इस्लामिया पर आक्रमण, कभी इलाहाबाद पर आक्रमण कभी फैजाबाद पर आक्रमण, कहीं नमाज़ अदा करने में पीटना कहीं लात मारना , कहीं रोज़े और त्योहार पर आक्रमण..सिलसिला चल पड़ा है...कभी संभल कभी भोजशाला... .. वक्फ़ बाई यूज़र इसीलिए खत्म किया गया है... उसके परिणाम सामने आने लगे हैं...
मुसलमानों की हर चीज़ पर आक्रमण है और देश में कोई गांधी नहीं, देश बचाने के लिए एक गांधी का होना ज़रूरी है, देश का मुसलमान हर दिन किसी नेता में गांधी तलाश करता है... मगर सब फट्टू हैं‌, खुल कर कोई साथ नहीं आता..... इकोसिस्टम ही ऐसा बन गया कि "मुसलमान" नाम लेते ही विपरीत वातावरण बनने लगता है।
इससे बिना डरे खुलकर सामने आना होगा , तभी देश‌‌ बचेगा क्योंकि मुसलमान जब-तक बर्दाश्त करेगा, तभी तक यह देश एक है... إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ देश के प्रति उसकी मुहब्बत ही उसके सब्र की इंतेहा है.